Sunday, February 25, 2018

होली ! एक याद.

होली ! एक याद.
लेखक :- राहुल  पांडेय
टीवी पर होली के गीत चल पड़े है | रंगो में सराबोर लाल नीले कथई रंगो से घर की टीवी का स्क्रीन रंगीन हो चुका है|  खाने के मेज पे बैठे बैठे रंगो को देख के अपनी जिंदगी की तुलना करते हुए पाता हु की मेरी अपनी जिंदगी कितनी बेरंग हो चुकी है | आज एहसास हो रहा है की बचपन वाली होली कितनी खूबसूरत होती थी |
हफ्ते भर पहले से ही घर पे होली की त्यारियां शुरू हो जाती है | घर पे माँ कड़ाही में गरम होते दूध को रख के कह जाती थी की कड़छी घूमते रहना वरना खोवा अच्छा नहीं बनेगा|  रंगो का कुछ ऐसा जूनून सवार था मानो पता नहीं क्या कुछ होने वाला हो | फागुन में तो भाभी और देवर के बीच - होली को लेके और भी ज्यादा नोक झोक शुरू हो जाते है | हमारे यहाँ पूर्वी उत्तर प्रदेश में फाल्गुन मास में फाग गाने का चलन है , जो की पूरे माह चलता है | घर के लड़के लड़किया फाल्गुन मॉस में अनायास ही मुस्कान लिए रहते है | लोग ढोल मंजीरा लेके पारम्परिक भोजपुरी फगुआ गीत गाते हुए कीसी भी द्वार पे फाग गाने के लिए बैठ जाते है | गाँव में तो होड़ सी लगी रहती है की आज मेरे यहाँ फाग होगा, तो आज मेरे यहाँ फाग होगा | पर दुःख है ,शायद आज यह परम्परा विलुप्त सी होती जा रही है |
हर घर से गुजिया, रसगुल्ले , गुलाब जामुन, खस्ता के जैसे पकवानो की खुशबू आनी  शुरू हो जाती हैँ|  बसंत ऋतू में सरसो के खेत से आती हुई खुशबू साथ ही साथ घरो से निकलने वाली पकवानो की खुशबू वातावरण को सुगंधित कर देते है|  साथ में गीत संगीत का माहौल कुछ ऐसा होता है की मानो ये दिन ये रात युही पुरी जिंदगी चलते रहे | आज तो खूबसूरत गीतों की जगह उन फूहड़ और अश्लील गीतों ने ले ली है जिन्हे भोजपुरी के गायक और भी फूहड़ बनाने में लगे हुए है |  प्रार्थना है भगवन से और सरकार से की इन फूहड़ गीतों को जल्द से जल्द बंद किया जाए |
वैसे तो मैं छत्तीसगढ़ में पला बढ़ा हु सो वहा की बाते ना कहु तो यह ज्यादती होगी | होलिका दहन के दिन नगाड़े बजाते हुए कालोनी के बच्चे गीत गुनगुनाते है " मुख मुरली बाजए , मुख मुरली बजाये छोटे से श्याम कन्हैया " | सारे लोग अपने अपने घरो से निकल कर लकडिया इकठ्ठा कर होलिका दहन करने में लगे होते है | माहौल में धमा  चौकड़ी मचाते हुए बच्चे अलग ही चार चाँद लगते है | ये लो पिचकारी खरदीने के लिए जो धमाचौकड़ी बच्चे करते है उसे तो मैं बताना ही  भूल गया | कौन सी पिचकारी लू ? बदूक वाली , मिक्की माउस वाली या पम्प वाली| जैसे तैसे कर के १ पिचकारी खरीद ली जाती है | साथ ही खूब सारा रंग ,गुलाल , अबीर, और गुब्बारे भी खरीद लाये जाते है | अब शुरू होता है पिचकारी के जाँचने का सिलसिला | फिर उसमे पानी भर के उसकी जांच परख की जाती है | सब कुछ सही हुआ तो कुछ पड़ोस के बच्चो को बुला के ये भी देख लिया जाता है की किसकी पिचकारी की धार ज्यादा दूर तक जाती है|  फिर धीरे से १ गुब्बारा पानी से भर के पड़ोस के अंकल के सर पे मार के आजमा भी लिया जाता है | गालियों का सिलसिला उधर से शुरू हो उससे पहले वह से नौ दो ग्यारह हो जाया जाता है |
होली का दिन ज्यो ही आता है सुबह सुबह घर के रसोई से मालपुवा बनने की खुशबू आने लगती है | कही दूर से होली की फ़िल्मी धुनें भी सुनाई देने लगती है जैसे की " रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे " , "होली के दिन दिन खिल जाते है "| जैसे ही सुबह का कोहरा छँटता है सारे बच्चे पुराने कपडे पहन होली खेलने निकल पड़ते है | फिल्मो की तरह नहीं की सफ़ेद नए कपडे  पहन होली खेले | बच्चे मुखौटा लगा के होली खेलते है , कोई नकली दाढ़ी मूछ भी लगा लेता है |  कोई पीछे से रंग भरे गुब्बारे भी फेक देता है | हम घर से होली खेलने के लिए पुरे लाव लस्कर के साथ निकल पड़ते है | पहले घर पे भगवन को रंग लगाने की परंपरा है फिर बड़ो को रंग लगा आशीर्वाद लो | तब बाल्टी में रंग घोल दोनों हाथो में अबीर की थैलियां ले बाहर निकलते है| अपनी मित्र मंडली के पास पहुंचते ही जो चेहरा अभी साफ़ सुथरा था एकदम रंगीन हो उठता है मानो  कोई इंद्रधनुष हो | कोई आगे से रंग लगता है कोई पीछे से कभी कभी तो साँसे रुक जाती है फिर हम भी अपने कोटे का रंग बारी बारी से सबको लगा के १ साथ बाहर निलते है | रास्ते में आने वाले हर व्यक्ति को रंग लगते हुए  हुए  आगे बढ़ते है | फिर रस्ते में शराब में टुल्ल मिश्रा जी , पांडेय जी, च्वहाण जी  सभी मिल जाते है और उनसे भी होली खेल आगे बढ़ होली मिलन स्थल की ओर पहुंचते है | होली मिलन में सब १ दूसरे के साथ रंगो में झूमते नाचते गाते नजर आते है | ठंडाई लिए हाथ में सब मस्त  होते है , ऐसा लगता है मानो होली  का गजब शुमार चढ़ा हुआ है |
होली में प्रेमी प्रेमिकाए भी गजब कहर ढाते है | स्कूल में सबका का कोई न कोई प्रेम होता है और हर प्रेमी यह सोचता है काश वो बहार आ जाये जिसे वो इतनी शिद्दत से देखना चाहता है | फिर कही दूर से वो दिख जाए तो होली का रोमांच ही कुछ अलग पराकाष्टा पे पहुंच चूका होता है | उसके पास जाके जब उसके कोमल गालो पे रंग लगता है तब वह उन चंदो छड़ में ही पता नहीं वो कितनी जिंदगी जी लेता है | उसके गाल का कोमल स्पर्श होते ही ऐसे लगता है मानो गुलाब की पंखुरि छू रहा हो,  जिसे ज्यादा जोर से रंग लगा दे तो कही मुरझा ना जाए | जब शरमाँ ते हुए अपनी मंडली में वापस आते है तो ऐसे अदब से आते है जैसे कोई जंग जीत के आ रहे है हो | उसने हमें रंग लगाया ना लगाया इसका कोई होश नहीं होता है हमें यही लगता है , हमने तो लगा लिया जी यही काफी है | मण्डली में सभी चिढ़ाते है और तुम शरमाते हुए कहते हो की क्या ? कुछ नहीं ? बस थोड़ा सा तो रंग लगाया | अंत में शुरू होता है कपडा फाड़ होली जिसमे सभी के ऊपरी वस्त्रो का चीरहरण कर दिया जाता है यही हमारी होली का आखरी हिस्सा होता है |

आज बैठे बैठे सोचता हु तो लगता है की काश वो दिन फिर से  आ जाए | अब तो होली कार्यालय की मेलबॉक्स तक ही रंगीन रह गयी है | होली के दिन कुछ परिचित और अपिरिचित आके रंग लगा जाते है और हम भी मुस्कुरा कर रंग का आभास कर लेते है किन्तु वो अपनापन नहीं होता है | कुछ तो सुनापन है इस होली मे| कुछ तो छूट गया है इस होली में जो शायद अब कभी लौट के ना आएगा | अब होली खेले भी कई साल हो चले है | अब होली में रंग चढ़ते ही नहीं और होली में वो बात दिखती ही नहीं |


लेखक :- राहुल  पांडेय