होली ! एक याद.
लेखक :- राहुल पांडेय
टीवी
पर होली के गीत चल पड़े है | रंगो में सराबोर लाल नीले कथई रंगो से घर की टीवी का स्क्रीन
रंगीन हो चुका है| खाने के मेज पे बैठे बैठे
रंगो को देख के अपनी जिंदगी की तुलना करते हुए पाता हु की मेरी अपनी जिंदगी कितनी बेरंग
हो चुकी है | आज एहसास हो रहा है की बचपन वाली होली कितनी खूबसूरत होती थी |
हफ्ते
भर पहले से ही घर पे होली की त्यारियां शुरू हो जाती है | घर पे माँ कड़ाही में गरम
होते दूध को रख के कह जाती थी की कड़छी घूमते रहना वरना खोवा अच्छा नहीं बनेगा| रंगो का कुछ ऐसा जूनून सवार था मानो पता नहीं क्या
कुछ होने वाला हो | फागुन में तो भाभी और देवर के बीच - होली को लेके और भी ज्यादा
नोक झोक शुरू हो जाते है | हमारे यहाँ पूर्वी उत्तर प्रदेश में फाल्गुन मास में फाग
गाने का चलन है , जो की पूरे माह चलता है | घर के लड़के लड़किया फाल्गुन मॉस में अनायास
ही मुस्कान लिए रहते है | लोग ढोल मंजीरा लेके पारम्परिक भोजपुरी फगुआ गीत गाते हुए
कीसी भी द्वार पे फाग गाने के लिए बैठ जाते है | गाँव में तो होड़ सी लगी रहती है की
आज मेरे यहाँ फाग होगा, तो आज मेरे यहाँ फाग होगा | पर दुःख है ,शायद आज यह परम्परा
विलुप्त सी होती जा रही है |
हर
घर से गुजिया, रसगुल्ले , गुलाब जामुन, खस्ता के जैसे पकवानो की खुशबू आनी शुरू हो जाती हैँ| बसंत ऋतू में सरसो के खेत से आती हुई खुशबू साथ
ही साथ घरो से निकलने वाली पकवानो की खुशबू वातावरण को सुगंधित कर देते है| साथ में गीत संगीत का माहौल कुछ ऐसा होता है की
मानो ये दिन ये रात युही पुरी जिंदगी चलते रहे | आज तो खूबसूरत गीतों की जगह उन फूहड़
और अश्लील गीतों ने ले ली है जिन्हे भोजपुरी के गायक और भी फूहड़ बनाने में लगे हुए
है | प्रार्थना है भगवन से और सरकार से की
इन फूहड़ गीतों को जल्द से जल्द बंद किया जाए |
वैसे
तो मैं छत्तीसगढ़ में पला बढ़ा हु सो वहा की बाते ना कहु तो यह ज्यादती होगी | होलिका
दहन के दिन नगाड़े बजाते हुए कालोनी के बच्चे गीत गुनगुनाते है " मुख मुरली बाजए
, मुख मुरली बजाये छोटे से श्याम कन्हैया " | सारे लोग अपने अपने घरो से निकल
कर लकडिया इकठ्ठा कर होलिका दहन करने में लगे होते है | माहौल में धमा चौकड़ी मचाते हुए बच्चे अलग ही चार चाँद लगते है
| ये लो पिचकारी खरदीने के लिए जो धमाचौकड़ी बच्चे करते है उसे तो मैं बताना ही भूल गया | कौन सी पिचकारी लू ? बदूक वाली , मिक्की
माउस वाली या पम्प वाली| जैसे तैसे कर के १ पिचकारी खरीद ली जाती है | साथ ही खूब सारा
रंग ,गुलाल , अबीर, और गुब्बारे भी खरीद लाये जाते है | अब शुरू होता है पिचकारी के
जाँचने का सिलसिला | फिर उसमे पानी भर के उसकी जांच परख की जाती है | सब कुछ सही हुआ
तो कुछ पड़ोस के बच्चो को बुला के ये भी देख लिया जाता है की किसकी पिचकारी की धार ज्यादा
दूर तक जाती है| फिर धीरे से १ गुब्बारा पानी
से भर के पड़ोस के अंकल के सर पे मार के आजमा भी लिया जाता है | गालियों का सिलसिला
उधर से शुरू हो उससे पहले वह से नौ दो ग्यारह हो जाया जाता है |
होली
का दिन ज्यो ही आता है सुबह सुबह घर के रसोई से मालपुवा बनने की खुशबू आने लगती है
| कही दूर से होली की फ़िल्मी धुनें भी सुनाई देने लगती है जैसे की " रंग बरसे
भीगे चुनर वाली रंग बरसे " , "होली के दिन दिन खिल जाते है "| जैसे
ही सुबह का कोहरा छँटता है सारे बच्चे पुराने कपडे पहन होली खेलने निकल पड़ते है | फिल्मो
की तरह नहीं की सफ़ेद नए कपडे पहन होली खेले
| बच्चे मुखौटा लगा के होली खेलते है , कोई नकली दाढ़ी मूछ भी लगा लेता है | कोई पीछे से रंग भरे गुब्बारे भी फेक देता है |
हम घर से होली खेलने के लिए पुरे लाव लस्कर के साथ निकल पड़ते है | पहले घर पे भगवन
को रंग लगाने की परंपरा है फिर बड़ो को रंग लगा आशीर्वाद लो | तब बाल्टी में रंग घोल
दोनों हाथो में अबीर की थैलियां ले बाहर निकलते है| अपनी मित्र मंडली के पास पहुंचते
ही जो चेहरा अभी साफ़ सुथरा था एकदम रंगीन हो उठता है मानो कोई इंद्रधनुष हो | कोई आगे से रंग लगता है कोई
पीछे से कभी कभी तो साँसे रुक जाती है फिर हम भी अपने कोटे का रंग बारी बारी से सबको
लगा के १ साथ बाहर निलते है | रास्ते में आने वाले हर व्यक्ति को रंग लगते हुए हुए आगे
बढ़ते है | फिर रस्ते में शराब में टुल्ल मिश्रा जी , पांडेय जी, च्वहाण जी सभी मिल जाते है और उनसे भी होली खेल आगे बढ़ होली
मिलन स्थल की ओर पहुंचते है | होली मिलन में सब १ दूसरे के साथ रंगो में झूमते नाचते
गाते नजर आते है | ठंडाई लिए हाथ में सब मस्त
होते है , ऐसा लगता है मानो होली का
गजब शुमार चढ़ा हुआ है |
होली
में प्रेमी प्रेमिकाए भी गजब कहर ढाते है | स्कूल में सबका का कोई न कोई प्रेम होता
है और हर प्रेमी यह सोचता है काश वो बहार आ जाये जिसे वो इतनी शिद्दत से देखना चाहता
है | फिर कही दूर से वो दिख जाए तो होली का रोमांच ही कुछ अलग पराकाष्टा पे पहुंच चूका
होता है | उसके पास जाके जब उसके कोमल गालो पे रंग लगता है तब वह उन चंदो छड़ में ही
पता नहीं वो कितनी जिंदगी जी लेता है | उसके गाल का कोमल स्पर्श होते ही ऐसे लगता है
मानो गुलाब की पंखुरि छू रहा हो, जिसे ज्यादा
जोर से रंग लगा दे तो कही मुरझा ना जाए | जब शरमाँ ते हुए अपनी मंडली में वापस आते
है तो ऐसे अदब से आते है जैसे कोई जंग जीत के आ रहे है हो | उसने हमें रंग लगाया ना
लगाया इसका कोई होश नहीं होता है हमें यही लगता है , हमने तो लगा लिया जी यही काफी
है | मण्डली में सभी चिढ़ाते है और तुम शरमाते हुए कहते हो की क्या ? कुछ नहीं ? बस
थोड़ा सा तो रंग लगाया | अंत में शुरू होता है कपडा फाड़ होली जिसमे सभी के ऊपरी वस्त्रो
का चीरहरण कर दिया जाता है यही हमारी होली का आखरी हिस्सा होता है |
आज
बैठे बैठे सोचता हु तो लगता है की काश वो दिन फिर से आ जाए | अब तो होली कार्यालय की मेलबॉक्स तक ही
रंगीन रह गयी है | होली के दिन कुछ परिचित और अपिरिचित आके रंग लगा जाते है और हम भी
मुस्कुरा कर रंग का आभास कर लेते है किन्तु वो अपनापन नहीं होता है | कुछ तो सुनापन
है इस होली मे| कुछ तो छूट गया है इस होली में जो शायद अब कभी लौट के ना आएगा | अब
होली खेले भी कई साल हो चले है | अब होली में रंग चढ़ते ही नहीं और होली में वो बात
दिखती ही नहीं |
लेखक
:- राहुल पांडेय
बचपन की होली। बहुत अच्छा लिखे है।
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद मित्र।
DeleteShi baat he bhaiya aj ke Holi wo mja nhi he
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